नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

मैं जब छोटी  थी - - - - 
  पहले कहानी फिर बनूं रानी

सुधा भार्गव



मैं  जब  छोटी  थी कहानी सुनने का  बड़ा  शौक  था I बिना  कहानी  सुने  खाना  ही  हजम  नहीं  होता  था I पहली  कक्षा  से  ही कृपा शंकर  मास्टर  जी  घर  पढ़ाने  आया  करते  I  उन्हें  मैं  मास्साब -मास्साब  कहा  करती I आते ही नारा  लगाते ---मुन्नी  रानी  करो  पढ़ाई |

झट  से  मेरा  जबाव  होता -पहले  कहानी  फिर  बनूँगी रानी I वे  कहानी  सुनाते  तभी  मेरे  बस्ते  का दरवाजा  खुलता I रोज  एक  कहानी  सोच कर  आते I कहानी  सुनाने  की  मेरी  जिद   पर  उन्होंने  कभी  आँखें  नीली  पीली  नहीं कीं I

एक  शनिवार को  मेरी  परीक्षा  होने  वाली  थी I शुक्रवार  को सीधे  पिताजी  के  सामने  जा  खड़े  हुए और  बोले
--आज  बिटिया  को आपके  आफिस  में पास  ही  पड़ी   मेज -कुर्सी  पर बैठकर पढ़ाना  चाहता  हूं I

मैं  उनके  पीछे  आज्ञाकारी  बालिका  की  तरह  सिर  झुकाए  खड़ी  थी I पिताश्री  समझ  गये -जरूर  मैंने  कोई  गुल  खिलाया  होगा I उन्होंने  हंसकर कुर्सी  की  ओर  बैठने  का इशारा किया I

मेरी  तो  बोलती  बंद- - ! मास्टर   जी  बस  बोले  जा रहे  थे ,समझाए  जा  रहे  थे I बीच -बीच  में  उपदेशों  की  झड़ी- - अच्छे  बच्चे  यह करते  हैं ,अच्छे  बच्चे  वह  करते  हैं I उधर   पिताजीकी तरफ  से  काली  घटाओं  के  आने  का  डर  I फँस  गयी - - -  बीच  में  मैं I जैसे  ही  मास्टर  जी उठे  मैं  भी  उठ  गई ,भागी -- - उनके  पीछे  दरवाजे  तक  गयी   और  धीरे  से  बोली -
-मास्साब , मेरी- -  कहानी !
- अभी  तो मैं  घूमने  जाऊंगा  कल  जरूर  सुना  देंगे I
-लेकिन  आज  की  कहानी !
मास्टर  जी  पसीज  गये I मुस्कान  बिखेरते  बोले --ठीक  है  ,शाम  को  आ जाना I

मैं  तो  फूल  की  तरह  खिल  गई  Iजल्दी  -जल्दी  बस्ता  समेटा  I दूध  पीकर बाहर  निकल  गयी I खेलने  में मन  कहाँ  रमने वाला !पलकें  तो  मास्टरजी  के  घर  के  रास्ते में  बिछी  हुई थीं I

उनके घर  पहुँची  तो  संकोच  में  लिपटे  पैरों  ने  आगे  बढ़ने  से  इंकार  कर  दिया I आगे  बढूँ या  लौट  जाऊँ - - -दुविधा  में  जान - -  -I वे  आँगन  में चारपाई  पर  बैठे  थे I उनके  सामने कांसे  की  चमकती  थाली  में घी  से  चुपड़ी  मक्के  की  गर्म -गर्म रोटी रखी  थी  जो  सरसों  की  सब्जी  के  साथ अपनी  सुगंध  फैला रही थी I

                     मुझे  देखते  ही  बड़े  स्नेह  से  बोले --लल्ली मेरे  पास
 आओ ,बैठो -- देख तो  बेला  कौन  आया  है !  मुनिया  के  लिए  भी  मक्के  की  रोटी  लाओ  I यह  भी हमारे   साथ  खायेगी I उन्होंने  अपनी  बेटी  से  कहा I                                                                                                      मैं  खाने  तो  बैठ  गई  मगर  अन्दर  से  धुकधुकी  शुरू --- -खाते  ही -खाते  अँधेरा  हो  गया  तो  मेरी कहानी  का  क्या  होगा ! अच्छी  बच्ची  की तरह  रात  आने  से  पहले  घर  भी  लौटना  था I इतने  में  मास्टर  जी  बोले  - -- खाओ -खाओ , वरना  कहानी  कैसे  सुनोगी I

मेरी  आँखों.  में  चमक  आगई रोटी  का   स्वाद  दुगुना  हो  गया  I                                                                    - -रोटी  तो  बहुत  मीठी  है |
मैं  बोली I
-चलो इसी रोटी की  मिठास  की  कहानी  सुनाता  हूं - - - I

एक  चिड़िया  थी I फुर्र  से  उड़ी I बुढ़िया 
के  आँगन  में  उतर  पड़ी I चार  मक्की  के  दाने  खाए ,चार  चोंच  में  भरे   फिर  मेरे घर  की  कोठरी  में  उतर  पड़ी I                  -फिर  क्या  हुआ !                                                  --बार -बार  मेरी  कोठरी  में  आती  और  दाने  रख  जाती I दानों  की पिसाई  हुई I
-कैसे  पिसाई  हुई  मास्साब  जी ?
-चक्की  से !
-फिर  क्या  हुआ !

 -मक्की  के  आटे  की  रोटियां  बनाईं |चिड़िया  आई , भर पेट  रोटी  खाई  I लम्बी  सी  उसने   डकार ली  I
मुझसे
बोली --तुम  भी  खाओ  दूसरों  को  भी  खिलाओ I
-  इसीलिये  मैं  भी  खा  रहा 
हूं ,तुम्हें  भी  खिला  रहा  हूं I

चिड़िया  के  मक्के  के  दाने  मेरे  दिमाग  में  सज  से  गयेI
दूसरे  दिन  खाना  बनाने  वाली महाराजिन  ताई से  बोली-
मैं  मक्के  की रोटी  खाऊंगी I                                 उसने  गाय  के घी  में  डूबी  छोटी -छोटी  रोटियां  बनाईं I
-ये  मास्साब   की  रोटी  की  तरह  मीठी  नहीं  हैं I मैं  खाते -खाते  बोली  |खाती जाती  और  बुरा  सा  मुहँ  भी  बना  देती I
-उनकी  रोटी  में  ऐसी  क्या  ख़ास  बात  है  हम  भी  तो  सुनें- - -  I
-उन के  घर  में जो  चिड़िया आई ,उसे  तुम  नहीं  जानतीं,   वह जो  दाना  लाई  उसे  पीसकर  मास्टरनी जी  ने  रोटी  बनाई I आह ! क्या  मीठी !
-इस  रोटी  का  आटा   और  मास्टरजी  की  रोटी  का  आटा   एक सा  ही  है I                                                  -नहीं ! नहीं ! उनका प्यारी  सी   चिड़िया  के  दाने  का मीठा -मीठा  आटा था
  I
मेरी  बात  पर  महाराजिन ताई  हँस  पड़ी I 
-मेरे  मास्टर  जी  क्या  झूठ  बोलेंगे I जाओ - - - मैं  तुमसे  नहीं  बोलती I  पैर  पटकती  हुई  रसोई  से  बाहर  चली  गई I
उनके  हाथ  की  बनी  मकई  की  रोटी  मैंने महीनों तक  नहीं  खाई I

बहुत  समय  बाद  जब विश्वास हुआ  कि मास्साब  के  घर  का  और  मेरे  घर  का मकई  आटा  समान  ही था I उन्होंने  तो  बस  मुझे  कहानी  सुनाई  थी तो  अपने  बुद्धूपन  पर खुद  ही  हँस  पड़ी I

तभी   मुझे कुछ  उड़ता  हुआ  नजर  आया I ओह !कहीं  मास्साब  की  चिड़िया मेरे  आँगन  में  तो  नहीं  उतरना  चाहती - - - पर  - - -नहीं  - - ऐसा  कुछ  नहीं  हुआ - - -बल्कि माँ -बाबा  के  आँगन  से मेरा  थोड़ा  बचपन उड़  गया I


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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मैं जब- - - - -

मैं जब   छोटी  थी
सब  से  भली  चवन्नी /
सुधा भार्गव





मैं  जब  छोटी  थी पढ़ती  कम  ,खेलती  ज्यादा  I पर   पिता  जी  का  अरमान  --   मैं  खूब  पढूँ  - -   पढ़ती  ही  जाऊँ  -- - -वह  भी  बिना ब्रेक  लिए I
दादी  की  असमय  मृत्यु  के कारण   उनकी  पढ़ाई  में बहुत अडचने   आईं I किसी  तरह   वे   बनारस  से  बी. फार्म  कर  पाए I  
   अब  मेरे  द्वारा अपनी  इच्छाएं  पूरी  करना  चाहते  थे  पर  मेरी  तो  जान  पर  बन  आई  I

सारे दिन  पढ़ाई - - -पढ़ाई  ,नये -नये  काम  सीखो  और  रिजल्ट  भी  अब्बल  I जरा भी  छुटके मुन्ना  भाई  से हुई  खटपट तो  सारा  दोष  मेरा  Iपट  से  आवाज आती - - - -मुन्नी ---किताब  लाओ  ---- जरा  देखूँ  --क्या  पढ़ा  है  I बड़े  शौक  से इंगलिश  पढ़ाते    मगर  महीने  में  एक  बार I जरा स्पेलिंग  बताने  में हिचकिचाई  बस --
गरजना -बरसना  शुरू   I    फिर  तो  जो  याद  होता  वह  भी  भूल  जाती I लगता   जीभ  तलुए  से  चिपक  गयी  है I

उस  रात  तो  गजब  हो  गया  I दिसंबर  का  महीना ,कड़ाके  की ठण्ड  Iकमरे  मे पक्के  कोयलों  की  अंगीठी  जल  रही  थी I हम  भाई -बहन  उस  के  पास बैठे  गर्मी  ले  रहे  थे  और  माँ  खाना  गर्म  कर  रही  थीं  I  पिताजी  को  पढ़ाने  की  धुन  ने  आन  दबोचा  I                                                         उनकी  कसौटी  पर  खरी  न उतरी  तो किताब  फाड़कर दहकते  कोयलों  के  हवाले  कर  दिया  Iधूँ-धूँ  करके  होली  जल  उठी I आंसुओं के  धुंधलके  में पिता  जी  पहचाने  ही  नहीं  जा  रहे  थे I कभी  वे  कंस  नजर  आते  तो  कभी  हिरण्यकश्यप  I
 वे  माँ से बोले --
इसके  बस की  पढ़ाई -लिखी  नहीं I कल  से  स्कूल  भेजना  बंद I नौकरों  की  छुट्टी  करो  और  इससे  करवाओ घर  का  सारा   काम  I

मैं  समझ  गयी  सिर  पर  आसमान  टूट पड़ा   है  पर  उसके  नीचे  पूरी  तरह  दबने  से  पहले    भागी  बाबा  के  कमरे  में I पिताजी  में  इतनी  हिम्मत  नहीं  थी  कि  बाबा  के  सामने  से  मुझे   खींच  कर  ले  जायें I तब  भी  घबराई सी   नजरें  दरवाजे  की  ओर  ही  लगी  थीं I                             जिसका  डर था  वही  हुआ  I चौखट  के  बाहर  खड़े -खड़े   ही  पिता श्री ने   इशारा  किया  --निकलकर   आ  I मैं  भला  लक्ष्मण  रेखा  क्यों  पार  करने  लगी I जल्दी  से  बाबा  के  पलंग  की  मसेरी उठाई और  धीरे  से  उनके  पास  लेट  गयी I बाबा  करवट  लेकर  लेटे  थे  चिड़िया  की  सी  नींद उनकी
आह्ट   पाते  ही  पूछने  लगे  ---                                                                      
-बेटी  क्या  बात  है ? तेरा  बाप  गुस्सा  क्यों  हो  रहा  है ?
-पता  नहीं बाबाजी ,बिना  बात  ही गुस्सा  हो  रहे  हैं I
-सोजा -- --सोजा  सुबह   तक  उसका  गुस्सा  ठंडा  हो  जायेगा I
बाबा जी  ने  मेरी  तरफ  करवट  बदली और  स्नेह से  मेरे  माथे  पर  हाथ  रखकर  थपकी  देने  लगे I  अपना   सुरक्षा  कवच  पा कर नन्हें  शिशु  की  तरह   
निंद्रा  की  गोदी  में  झूलने  लगी |

सबेरे -सबेरे उनके  खिले  चेहरे  को  देखकर कोई  कह  नहीं  सकता  था कि  कल  बालकाण्ड  के  साथ -साथ  लंका  कांड इन्होंने ही  किया  था I
सोच -सोचकर  दिमाग  फटा  जा  रहा  था  कि  स्कूल  कैसे  जाऊँ I मेरी  बेचैनी  पिता श्री  समझ  गये  बोले -
स्कूल  जाने  से  पहले  चवन्नी  (२५ पैसे  का  पुराना  सिक्का )
लेते  जाना चाट -पकौड़ी  के   लिए I
-स्कूल  कैसे  जाऊँ ?किताबें  तो  आपने  - - - - I
-१० बजे  जैसे ही  दुकान  खुलेगी  एकदम  नई  किताब  खरीदी  जायेगी और  तुम्हारे    पास  पहुँच  जायेगी |
चवन्नी  कि  नाम  पर  झूमने  सी  लगी  थी i नई  किताब  की  खुशबू  भी  अच्छी  लगी |

  पिता  जी  का  रौद्र  रूप दिमाग से    पल  में  उड़न-छू  हो  गया  और  दूसरी  लहर  उसमें  समा  गई--- - - - --
मेरे  पिताजी दुनिया  के  सबसे  अच्छे  पिता  हैं |

मन ही  मन  खिचड़ी पकाने   लगी - - आज तो  अपनी  सहेलियों  को  इस  चवन्नी  से बेर  -मूंगफली  खिलाऊंगी  I
  आह !मेरी  प्यारी  चवन्नी - - - I
उसे  चूमती  -पुचकारती  स्कूल  चल  दी  I
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